रविवार, 28 मार्च 2010

प्रेम-1
तुम प्रेम का कौन- सा रूप हो
तुम अवसान हो या प्रारंभ
तुम भावों के बीज हो या वृक्ष
तुमसे कुछ जन्मा है या पूर्ण हुआ है
तुम देव नहीं
क्योंकि पत्थर तो तुम हो नहीं सकते
तुम मनुष्य भी नहीं
तुम्हारे पास तो ह्रदय है
तुम कुछ नया हो, कुछ अलग
तुम समय से बहुत आगे खड़े हो
या अभी यात्रा शुरू ही नहीं की !!!
प्रेम-2
वह प्रेम का देवता
मेरे करीब आया
मुझे अपना बताया
दिलाता हुआ यकीं
झुका मेरे क़दमों में
और पैरों तले की जमीं खींच ली..........